जब महाभारत युद्ध के बाद महाराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हो चुका था और भगवान् श्रीकृष्ण हस्तिनापुर से द्वारका की ओर लौट रहे थे। मार्ग में जाते हुए भगवान् के दर्शन की लालसा से कुरुवंश की स्त्रियां अटारियों पर चढ गयी और प्रेम‚ लज्जा एवं मुस्कान से युक्त चितवन से उन्हें देखती हुई उन पर पुष्पवर्षा करने लगीं।

वे आपस में कहने लगी—
स वै किलायं पुरुषः पुरातनो य एक आसीदविशेष आत्मनि।
अग्रे गुणेभ्यो जगदात्मनीश्वरे निमीलितात्मन्निशि सुप्तशक्तिषु।।
ये वे ही पुरातन पुरुष है‚ जो प्रलय के समय भी अपने निर्विशेष स्वरूप में स्थित रहते हैं। उस समय सृष्टि के मूल तीनों गुण भी नही रहते। जगदात्मा ईश्वर में जीव भी लीन हो जाते है और महतत्त्वादि शक्तियां अपने कारण अव्यक्त में सो जाती हैं।
स एव भूयो निजवीर्यचोदितां स्वजीवमायां प्रकृतिं सिसृक्षतीम्।
अनामरूपात्मनि रूपनामनी विधित्समानोऽनुससार शास्त्रकृत्।।
उन्होंने ही फिर अपने नाम-रूपरहित स्वरूप में नामरूप के निर्माण की इच्छा की तथा अपनी कालशक्ति से प्रेरित प्रकृति‚ जो कि उसके अंशभूत जीवों को मोहित कर लेती है और सृष्टि की रचना में प्रवृत्त रहती है‚ का अनुसरण किया और व्यवहार के लिये वेदादि शास्त्रों की रचना की।
स वा अयं यत्पदमत्र सूरयो जितेन्द्रिया निर्जितमातरिश्वनः।
पश्यन्ति भक्त्युत्कलितामलात्मना नन्वेष सत्त्वं परिमार्ष्टुमर्हति।।
जिसके स्वरूप का साक्षात्कार जितेन्द्रिय योगी अपने प्राणों को वश में करके भक्ति से प्रफुल्लित निर्मल हृदय में करते हैं‚ ये श्रीकृष्ण वही साक्षात् परब्रह्म हैं। वास्तव में इन्हीं की भक्ति से अन्तःकरण की पूर्ण शुद्धि हो सकती है‚ अन्य साधनों द्वारा नहीं।
स वा अयं सख्यनुगीतसत्कथो वेदेषु गुह्येषु च गुह्यवादिभिः।
य एक ईशो जगदात्मलीलया सृजत्यवत्यत्ति न तत्र सज्जते।।
हे सखीǃ ये वही हैं‚ जिनकी सुंदर लीलाओं का गायन वेदों में और दूसरे गोपनीय शास्त्रों में व्यासादि रहस्यवादी ऋषियों ने किया है— जो एक अद्वितीय ईश्वर है और अपनी लीला से संसार की सृष्टि‚ पालन तथा संहार करते है‚ परंतु उनमें आसक्त नही होते।
यदा ह्यधर्मेण तमोधियो नृपा जीवन्ति तत्रैष हि सत्त्वतः किल।
धत्ते भगं सत्यमृतं दयां यशो भवाय रूपाणि दधद्युगे युगे।।
जब तामसी बुद्धिवाले राजा अधर्म से चलने लगते हैं तब ये ही सत्त्वगुण को स्वीकार कर ऐश्वर्य‚ सत्य‚ ऋत‚ दया और यश प्रकट करते और संसार के कल्याण के लिये युग-युग में अनेकों अवतार धारण करते है।
अहो अलं श्लाघ्यतमं यदोः कुलमहो अलं पुण्यतमं मधोर्वनम्।
यदेष पुंसामृषभः श्रियः पतिः स्वजन्मना चंक्रमणेन चाञ्चति।।
अहोǃ यह यदुवंश परम प्रशंसनीय है; क्योंकि श्रीपति पुरुषोत्तम भगवान् ने जन्म ग्रहण करके इस वंश को सम्मानित किया है। वह पवित्र व्रजमण्डल भी परम धन्य है‚ जिसे इन्होंने अपने शैशव एवं किशोरावस्था में घूम-फिरकर सुशोभित किया है।
अहो बत स्वर्यशसस्तिरस्करी कुशस्थली पुण्ययशस्करी भुवः।
पश्यन्ति नित्यं यदनुग्रहेषितं स्मितावलोकं स्वपतिं स्म यत्प्रजाः।।
अहोǃ द्वारका ने स्वर्ग के यश का तिरस्कार कर पृथ्वी के पवित्र यश को बढाया है क्योंकि वहां की प्रजा अपने स्वामी श्रीकृष्ण को‚ जो मंद-मंद मुस्कुराते हुए उन्हें कृपादृष्टि से देखते हैं‚ निरंतर निहारती रहती है।
नूनं व्रतस्नानहुतादिनेश्वरः समर्चितो ह्यस्य गृहीतपाणिभिः।
पिबन्ति याः सख्यधरामृतं मुहुर्व्रजस्त्रियः सम्मुमुहुर्यदाशयाः।।
सखीǃ जिनका इन्होने पाणिग्रहण किया है‚ उन स्त्रियों ने अवश्य ही व्रत‚ स्नान‚ हवन आदि के द्वारा इन परमात्मा की आराधना की होगी; क्योंकि वे बार-बार इनकी उस अधरसुधा का पान करती हैं‚ जिसके स्मरणमात्र से व्रजबालाएं आनंद से मूर्च्छित हो जाया करती थीं।
या वीर्यशुल्केन हृताः स्वयंवरे प्रमथ्य चैद्यप्रमुखान् हि शुष्मिणः।
प्रद्युम्नसाम्बाम्बसुतादयोऽपरा याश्चाहृता भौमवधे सहस्रशः।।
ये स्वयंवर में शिशुपाल आदि मतवाले राजाओं का मानमर्दन कर जिनको अपने बाहुबल से हर लाये थे तथा जिनके पुत्र प्रद्युम्न‚ साम्ब‚ आम्ब आदि हैं‚ वे रुक्मिणी आदि आठों पटरानियां और भौमासुर को मारकर लायी हुई जो इनकी सहस्रों अन्य पत्नियां हैं‚ वे वास्तव में धन्य है
एताः परं स्त्रीत्वमपास्तपेशलं निरस्तशौचं बत साधु कुर्वते।
यासां गृहात्पुष्करलोचनः पतिर्न जात्वपैत्याहृतिभिर्हृदि स्पृशन्।।
क्योंकि इन सभी ने स्वतंत्रता और पवित्रता से रहित स्त्रीजीवन को पवित्र और उज्ज्वल बना दिया है। इनके स्वामी कमलनयन श्रीकृष्ण हैं‚ जो नानाविध प्रिय चेष्टाओं तथा वस्तुओं की भेंट से इनके हृदय में प्रेम व आनंद की अभिवृद्धि करते हुए कभी एक क्षण के लिये भी इनके घर को छोड़कर नहीं जाते।
संदर्भ ग्रंथ— श्रीमद्भागवतमहापुराण प्रथम स्कंध अध्याय 10

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