प्रणव का अर्थ (Meaning of Pranava)

 विद्वज्‍जन ओंकार को प्रणव की संज्ञा देते है, इसे वेदादि भी कहा जाता है। 


अब इसके शाब्दिक विवेचन पर जाएंगे-

  • प्रकृति से उत्‍पन्‍न संसाररूपी महासागर को 'प्र' कहते है, इसे पार करने के लिये जो नौका (नाव) है, उसे 'प्रणव' कहते है। 
  • प्र - प्रपंच, न- नहीं है, व:- तुम्‍हारे लिये। अर्थात इसका आश्रय लेनेवालों का सांसारिक प्रपंच समाप्‍त हो जाता है, इसलिये इसे प्रणव नाम से जानते है। 
  • प्र- प्रकर्षेण, न-नयेत्, व:- युष्‍मान् मोक्षम् इति वा प्रणव:। अर्थात यह तुम सब उपासकों को बलपूर्वक मोक्ष तक पहुंचा देगा, इस अभिप्रााय से मुनिजन इसे प्रणव कहते है।
  • अपना जप करनेवाले योगियों एवं उपासकों के समस्‍त कर्मों का नाश करके यह दिव्‍य नूतन ज्ञान देता है, इसलिये भी इसका नाम प्रणव है।
  • वे परमात्‍मा प्रकृष्‍ट रूप से नवीन है, इसलिये प्रणव कहलाते है।
  • प्रकृष्‍ट रूप से नव- दिव्‍य परमात्‍मज्ञान प्रकट करता है, इसलिये वह प्रणव कहा गया है। 

अब आते है प्रणव के भेद पर- प्रणव के दो भेद है- स्‍थूल एवं सूक्ष्‍म।

एक अक्षर रूप जो 'ओम्' है, उसे सूक्ष्‍म प्रणव जानना चाहिये और 'नम: शिवाय' इस पंचाक्षर मंत्र को स्‍थूल प्रणव जानना चाहिये।  

शिवपुराण के अनुसार 'अ' यानि ब्रह्मा (बीज), 'उ' यानि विष्‍णु (प्रकृति), 'म' यानि महेश्‍वर (बीजी-प्रकृति में बीज स्‍थापित करने वाला) कहे गये है।  'अ उ म्' यानि ओंकार,  यही त्रिदेवात्‍मक है। 


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