जब महर्षि पिप्पलाद की पत्नी पद्मा ने धर्मराज को शाप दे दिया तब उसे भगवान् शिव की इच्छा जानते हुए धर्मराज ने यह लघु परंतु सारगर्भित स्तोत्र कहा था—
सम्पदं विपदं यो हि नमस्तस्मै शिवाय हि।।
जो स्वयं सबको महान् सुख-दुःख देनेवाले हैं और संपत्ति तथा विपत्ति देने में समर्थ हैं‚ उन शिव के प्रति नमस्कार है।
शत्रुं मित्रं संविधांतुं प्रीतिं च कलहं क्षमः।
स्रष्टुं नष्टुं च यस्सृष्टिं नमस्तस्मै शिवाय हि।।
जो शत्रु‚ मित्र‚ प्रीति तथा कलह का विधान करने में और सृष्टि का सृजन एवं संहार करने में समर्थ हैं‚ उन शिव को नमस्कार है।
येन शुक्लीकृतं क्षीरं जले शैत्यं कृतं पुरा।
दाहीकृतो हुताशश्च नमस्तस्मै शिवाय हि।।
जिन्होंने पूर्वकाल में दूध को शुक्लवर्ण का बनाया‚ जल में शैत्य (ठण्डक) उत्पन्न किया और अग्नि को दाहकता प्रदान की‚ उन शिव को नमस्कार है।
प्रकृतिर्निर्मिता येन तत्त्वानि महादादितः।
ब्रह्मविष्णुमहेशाद्या नमस्तस्मै शिवाय हि।।
जिन्होंने प्रकृति का‚ महदादि तत्त्वों को एवं ब्रह्मा‚ विष्णु‚ महेशादि का निर्माण किया है‚ उन शिव को नमस्कार है।
संदर्भ— शिवपुराण रुद्रसंहिता पार्वतीखण्ड अध्याय 35


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