व्‍यास-अर्जुन संवाद | vyas arjun samvad

     यह प्रसंग उस समय का है‚ जब श्रीकृष्ण अपने अवतार के प्रयोजन को पूर्ण कर अपने परमधाम को पधार चुके थे और अर्जुन उनके परिवार को लेकर द्वारका से इंद्रप्रस्थ की ओर आ रहे थे। तब आभीरों ने बलपूर्वक अर्जुन के संरक्षण में जा रही श्रीकृष्ण की स्त्रियों का हरण कर लिया किंतु गाण्डीवधारी अर्जुन उनकी रक्षा करने में समर्थ न हो सके। इस घटना के कारण अर्जुन अत्यन्त श्रीहीन और उदास हो गये। 

    यादवनंदन व्रज का अभिषेक कर वे व्यासमुनि से मिले। अर्जुन को बहुत देर तक अपने चरणों की वंदना करते देख मुनिवर ने पूछ ही लिया— हे अर्जुनǃ ʺआज तुम इस प्रकार कांतिहीन और हतप्रभ कैसे हो रहे होॽʺ तब अर्जुन ने लंबी सांस छोडते हुए आभीरों द्वारा हुई अपनी पराजय का वृत्तांत यथावत् सुना दिया। 

    तब व्यासमुनि ने अर्जुन के शोक को दूर करने वाला बड़ा सुंदर उपदेश दिया— हे पार्थǃ तुम्हारी लज्जा तथा शोक व्यर्थ है। तुम संपूर्ण भूतों में काल की ऐसी ही गति जानो। प्राणियों की उन्नति और अवनति का कारण काल ही है‚ इन जय-पराजयों को काल के अधीन जानकर तुम स्थिरता धारण करो। नदियां‚ समुद्र‚ गिरिगण‚ संपूर्ण पृथ्वी‚ देव‚ मनुष्य‚ पशु‚ वृक्षादि संपूर्ण पदार्थ काल के ही रचे हुए है और काल से ही क्षीण हो जाते हैं‚ अतः इस सारे प्रपंच को कालात्मक जानकर शांत हो जाओ। 

    हे धनंजयǃ तुम्हारे सखा कमलनयन श्रीकृष्ण साक्षात् कालस्वरूप ही है। उन्होंने जिस कारण भूतल पर अवतार लिया था‚ वह कार्य पूर्ण हो जाने पर वे अपनी इच्छानुसार वापस चले गये। अतः हे पार्थǃ तुम्हें अपनी पराजय से दुःखी नही होना चाहिये‚ क्योंकि अभ्युदय काल उपस्थित होने पर ही पुरुषों से ऐसे कर्म बनते हैं‚ जिनसे उनकी स्तुति होती है। तुम भीष्म‚ द्रोणादि सहित संपूर्ण कौरवों को मार डालोगे— इस बात को कौन मान सकता था और फिर यह भी किसे विश्वास होगा कि तुम आभीरों से हार जाओगे। हे पार्थǃ यह सब सर्वात्मा भगवान् की लीला का कौतुक है कि तुमने कौरवों काे विनष्ट कर दिया गया और फिर स्वयं अहीरों से पराजित हो गये।  

    हे पाण्डवǃ तुम लोगों का अंत भी निकट ही है; इसलिये उन सर्वेश्वर ने तुम्हारे बल‚ तेज‚ वीर्य और माहात्म्य का संकोच कर दिया है। अतः तुम ऐसा जानकर अपने भाईयों सहित संपूर्ण राज्य को छोड़कर वनको जाओ। मुनिवर के ऐसा कहने पर अर्जुन ने अपने भाईयों को जो कुछ देखा व सुना था‚ सब ज्यों-का-त्यों सुना दिया। उन सब पाण्डुपुत्रों ने व्यासमुनि का संदेश सुनकर राज्यपद पर परीक्षित् को अभिषिक्त किया और स्वयं वन को चले गये। 

    इस प्रकार हमने जाना कि उपयुक्त काल आने पर ही मनुष्यों द्वारा की गयी क्रियाएं समुचित कही जाती है। श्रीकृष्ण द्वारा भी अर्जुन को उपदेश दिया गया लेकिन उस समय वे सब कुछ छोड़कर वन को नही गये; क्योंकि वह समय वन जाने का नहीं था‚ अपितु कर्तव्य-पालन का था। लेकिन जब व्यासजी ने उपदेश किया तब अर्जुन अपने सभी भाईयों के साथ वन को चले गये क्योंकि तब तक उनके सारे कर्तव्य पूर्ण हो चुके थे। 

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