घुश्‍मा चरित | घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग

    दक्षिण दिशा में देवगिरि नामक पर्वत के समीप भारद्वाज कुल में उत्‍पन्‍न सुधर्मा नामक ब्राह्मण रहता था, उसकी पतिपरायण तथा गृहकार्यों में दक्ष सुदेहा नामक भार्या थी। सुधर्मा वेदमार्ग के अनुसार आचरण करनेवाला, अग्निहोत्री, वेद-शास्‍त्रों का विद्वान्, धनवान्, दानी, श्रेष्‍ठ तथा शिवभक्ति में रत रहनेवाला था। धर्माचरण करते हुए उसकी बहुत-सी आयु बीत गयी किंतु कोई पुत्र उत्‍पन्‍न नहीं हुआ। ''आत्‍मा ही अपना उद्धार करनेवाला है और वही अपने को पवित्र करनेवाला भी है।''- ऐसा मन में विचारकर वह ब्राह्मण दु:खित नही हुआ, किंतु सुदेहा को पुत्र न होने का महान् दु:ख रहता था। वह अपने पति से पुत्रोत्‍पत्ति हेतु प्रयत्‍न करने की नित्‍य प्रार्थना करती थी। सुधर्मा उसे समझाता रहता था कि हे देवि! तीनो लोकों में सभी नि:संदेह स्‍वार्थ का ही साधन करनेवाले है। पुत्र क्‍या करेगा? तुम निश्‍चयपूर्वक दु:ख का त्‍याग करो और मुझसे नित्‍य इसके लिये मत कहा करो।  

    किसी समय सुदेहा सखियों की गोष्‍ठी में सम्मिलित होने के लिये अपने पड़ोसी के घर गयी, वहीं पर परस्‍पर विवाद होने लगा। उस पड़ोसी की स्‍त्री ने सुदेहा को धिक्‍कारते हुए कहा- हे अपुत्रिणि! तुम किस बात का गर्व कर रही हो? मेरा धन तो मेरा पुत्र भोगेगा, किंतु तुम्‍हारे धन का भोग कौन करेगा? निश्चय ही तुम्हारा धन राजा ले लेगा। हे वन्ध्याǃ तुम्हें धिक्कार है। इस प्रकार उन स्त्रियों के द्वारा अपमानित होकर दुःखित सुदेहा ने घर आकर अपने पति से सारी बात कही‚ तब भी सुधर्मा को कुछ दुःख न हुआ। उसने कहा— हे प्रियेǃ कहने दो‚ जो होनहार है‚ वही होता है। उसने बारंबार सुदेहा को समझाया‚ किंतु पुत्रप्राप्ति की प्रबल कामना से युक्त सुदेहा बोली— आप चाहे किसी भी उपाय से पुत्र उत्पन्न करें‚ अन्यथा मैं अपना शरीर त्याग दूंगी। 

    इस वचन को सुनकर सुधर्मा ने भगवान् शिव का स्मरण कर दो पुष्प लेकर अग्नि के सामने रख दिये‚ उसने दाहिनेवाले पुष्प को मन में पुत्रदायक समझा। इस प्रकार का संकल्प करके उसने अपनी पत्नी से कहा— पुत्रप्राप्ति हेतु इन दोनों में से एक पुष्प उठाओ। सुदेहा ने शिव तथा अग्नि को प्रणाम करके एक पुष्प उठा लिया‚ लेकिन उस पुष्प को नही उठाया‚ जिसे उसके पति ने सोचा था। यह देखकर सुधर्मा ने लंबी श्वास लेकर कहा— प्रियेǃ ईश्वर ने जो रच दिया है‚ वह अन्यथा कैसे हो सकता है। ऐसा कहकर उसने पुत्र की आशा त्याग दी लेकिन सुदेहा ने आग्रह नही छोड़ा। 

    उसने पुत्रकामना से हाथ जोड़कर पति से प्रेमपूर्वक कहा— हे स्वामिन्ǃ मुझसे पुत्र उत्पन्न नही होगा तो आप मेरी बहन घुश्मा से विवाह कर लें। तब सुधर्मा बोले— इस समय तो तुम विवाह करने के लिये कह रही हो‚ किंतु जब वह पु्त्र उत्पन्न कर लेगी‚ तब तुम उससे ईर्ष्या करने लगोगी। सुदेहा ने उत्तर दिया— मैं अपनी बहन से कभी ईर्ष्या नहीं करूंगी‚ आप पुत्रोत्पत्ति के निमित्त उसके साथ विवाह कीजिये‚ मैं अनुमति देती हूं।

    इस प्रकार सुदेहा के प्रार्थना किये जाने पर सुधर्मा ने विवाहविधि से घुश्मा का पाणिग्रहण कर लिया। सुदेहा अपनी बहन के साथ सखी की भांति व्यवहार करने लगी और विरोधभाव का त्याग कर उसकी देखरेख करने लगी। घुश्मा अपनी बहन की आज्ञा प्राप्त कर नित्य 101 पार्थिव शिवलिंग का निर्माण करती थी‚ फिर विधिपूर्वक षोडशोपचार से पूजनकर पास में स्थित तालाब में उन्हें विसर्जित कर देती थी। इस प्रकार नित्य शिवपूजन करते हुए उसकी एक लाख पार्थिव संख्या पूरी हुई। उसके अनन्तर शिवकृपा से उसे सुंदर और गुणवान् पुत्र उत्पन्न हुआ। 

घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग

    सुधर्मा उस पुत्र को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और ज्ञानधर्मपरायण होकर सुखोपभोग करने लगा। परंतु सुदेहा के मन में ईर्ष्याभाव का उदय हो गया। अपनी छोटी बहन के पुत्रसुख को सहन न करती हुई वह उससे विरोध करने लगी। सब लोग घुश्मा की निरंतर प्रशंसा करते थे‚ किंतु सुदेहा को यह सब तथा शिशु का रूप आदि सहन नही होता था। कुछ समय व्यतीत होने पर सुधर्मा ने अपने पुत्र का विवाह कर दिया। अब सभी संंबंधी घुश्मा का और भी सम्मान करने लगे। उसे देखकर सुदेहा मन ही मन जलने लगी। घुश्मा तो अपनी बहन से कहती थी कि ये पुत्र तथा पुत्रवधू तुम्हारे ही है‚ मेरे नही। पुत्र तथा बहू भी उसे माता तथा सास ही मानते थे। सुधर्मा भी अपनी ज्येष्ठ स्त्री का कनिष्ठा से अधिक आदर करता था‚ फिर भी सुदेहा अपने मन में कपट रखती थी। 

    एक दिन सुदेहा ने विचार किया— मेरे हृदय की अग्नि घुश्मा के दुःखजनित अश्रुओं से ही शांत होगी‚ इसलिये आज ही मै उसके पुत्र को मार डालूंगी। ऐसा विचारकर उसने छुरी लेकर रातमें वधू के साथ सोये हुए पुत्र के अंगों को खण्ड खण्ड काट डाला और रात्रि में ले जाकर तालाब में उसी स्थान पर फेंक दिया‚ जहां पर घुश्मा नित्य शिवलिंगों का विसर्जन किया करती थी। यह कुकृत्य करके वह लौट आयी और सुखपूर्वक सो गयी। 

    प्रातःकाल होने पर नववधू रुधिर से सनी हुई तथा पति के शरीर के टुकडो से युक्त शय्या को देखकर अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगी। तब सुदेहा भी बाहर से दुःख प्रकट करने लगी‚ परन्तु घुश्मा अपनी पुत्रवधू के दुःख को सुनकर भी पार्थिव पूजनरूप व्रत से विचलित नहीं हुई। सुधर्मा भी जब तक व्रतविधि समाप्त नहीं हुई‚ तब तक वैसा ही रहा। पूजन के बाद मध्याह्नकाल में उस भयानक शय्या को देखकर भी घुश्मा ने कुछ भी दुःख नहीं माना।

       ʺजिन्होंने यह पुत्र दिया है‚ वे ही रक्षा भी करेंगे। भक्तवत्सल‚ महाकाल‚ हमारे एकमात्र रक्षक सदाशिव के रहते चिन्ता की बात ही क्या हैॽ वे ही लीलापूर्वक प्राणियों का संयोग-वियोग कराते है। इस समय मेरे चिंता करने से क्या होनेवाला है।ʺ इस तत्त्व का विचारकर वह दुःखी नही हुई और धैर्य धारण किये रही। स्थिरचित्त होकर पूर्व की भांति पार्थिव शिवलिंगों को लेकर शिवनाम का उच्चारण करती हुई वह सरोवर के तट पर गयी। जब वहां पार्थिव लिंगों को डालकर वह लौटने लगी‚ तब उसने सरोवर के तट पर खड़े अपने पुत्र को देखा। 

    पुत्र बोला— हे माताǃ आओ‚ मैं तो मर गया था‚ किंतु तुम्हारे पुण्य के प्रभाव से और शिवकृपा से अब जीवित हो गया हूं। वह घुश्मा अपने पुत्र को जीवित देखकर भी वैसे ही अधिक प्रसन्न न हुई‚ जैसा कि उसके मरने पर दुःखी न थी‚ वह यथावत् शिव के ध्यान में तत्पर रही। इसी समय वहां संतुष्ट हुए ज्योतिस्वरूप सदाशिव शीघ्र प्रकट हो गये और कहने लगे— हे वराननेǃ मैं प्रसन्न हूं‚ तुम वर मांगो‚ सुदेहा ने इसे मारा था‚ अब मै त्रिशूल से उसे मारूंगा। तब विनत हुई घुश्मा ने उन्हें प्रणामकर यही वर मांगा— हे नाथǃ आप मेरी बहन सुदेहा की रक्षा कीजिये। भगवान् शिव बोले— उस अपकार करनेवाली पर तुम उपकार क्यों कर रही होॽ यह तो वध के योग्य है। 

    घुश्मा बोली— प्रभोǃ आपके दर्शनमात्र से पाप नही रह जाता है‚ इसलिये आपको दर्शन करते ही उसके सभी पाप दूर हो गये। जो पुरुष अपकार करनेवालों के प्रति उपकार करता है‚ उसके दर्शनमात्र से ही पाप दूर भाग जाते है। हे देवǃ मैंने भगवान् का ऐसा अद्भुत वाक्य सुना है। हे सदाशिवǃ जिसने जैसा किया है‚ वह वैसा करे। घुश्मा के द्वारा ऐसा कहे जाने पर महेश्वर ने अतीव प्रसन्न होकर उससे पुनः वर मांगने को कहा। तब उसने कहा— यदि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं तो आप संसार की रक्षा के निमित्त मेरे नाम से यहीं पर स्थित हो जाइये। 

    इस पर महेश्वर बोले— हे घुश्मेǃ मैं तुम्हारे नाम से घुश्मेश्वर के रूप में प्रसिद्ध होकर यहां निवास करूंगा। यहां पर मेरा घुश्मेश्वर नामक शुभ ज्योतिर्लिंग प्रसिद्ध होगा और यह सरोवर सदा सभी लिंगों का निवासस्थान होगा। इसलिये यह शिवालय नाम से तीनों लोकों में प्रसिद्ध होगा। यह सरोवर दर्शनमात्र से सभी कामनाओं का पूर्ण करनेवाला होगा। हे सुव्रतेǃ तुम्हारे वंश में एक सौ एक पीढी पर्यंत इसी प्रकार के श्रेष्ठ पुत्र होते रहेंगे‚ वे सुंदर स्त्रीवाले‚ महाधनी‚ दीर्घजीवी‚ विद्वान्‚ उदार तथा भोग-मोक्ष के फल को प्राप्त करनेवाले होंगे। इन सबको एक सौ एक पुत्र होंगे‚ जो गुणों में एक से बढकर एक होंगे। इस प्रकार तुम्हारे वंश का अति सुंदर विस्तार होगा। 

    ऐसा कहकर शिवजी वहां ज्योतिर्लिंग रूप से स्थित हो गये। उस समय वहां पर आये हुए सुधर्मा‚ सुदेहा और घुश्मा ने उनकी एक सौ एक बार परिक्रमा की। पुत्र को जीवित देखकर वह सुदेहा लज्जित हो गयी और उसने क्षमा मांगकर अपने पापों को दूर करनेवाले व्रत का अनुष्ठान किया। 

    इस प्रकार घुश्मा के चरित्र से सुशोभित यह घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा कही गयी। जो इस कथा को पढता या सुनता है‚ वह सभी पापों से मुक्त होकर भोग तथा मोक्ष प्राप्त करता है। 

    

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